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कॉमनवेल्थ: गुरुराजा ने वेटलिफ्टिंग में जीता सिल्वर

     Last Updated:(11:33 AM) 05 Apr 2018
गोल्ड कोस्ट. कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले ही दिन वेटलिफ्टर गुरुराजा पुजारी ने भारत का खाता खोला। उन्होंने गुरुवार को 56 किलोग्राम (मैन्स) कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीता। मलेशिया के मोहम्मद एएच इजहार अहमद ने गोल्ड अपने नाम किया। वहीं, श्रीलंका के चतुरंगा लकमल को ब्रॉन्ज मिला। पिछली बार 2014 के ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के सुखन डे ने 56 किग्रा (मैन्स) कैटेगरी में गोल्ड जीता था। उन्होंने कुल 248 किग्रा का वजन उठाया था। इस बार गुरुराजा कुल 249 किग्रा का वजन उठाने के बाद भी सिल्वर मेडल ले पाए। बता दें कि गुरुराजा कर्नाटक के रहने वाले हैं। उनके पिता ट्रक चलाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बाद भी उनके परिवार ने उन्हें वो हर चीज दिलाई, जो उनके इस गेम को बेहतर बनाने के लिए जरूरी थी। गुरुराजा रेसलर सुशील कुमार से प्रभावित थे। उन्हें देखकर वे कुश्ती सीखना चाहते थे। लेकिन कोच के कहने पर वेटलिफ्टिंग में करियर बनाया।25 साल के गुरुराजा पुजारी ने 56 किलोग्राम (मैन्स) कैटेगरी में कुल 249 किग्रा (स्नैच में 111 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 138 किग्रा) वजन उठाया।गुरुराजा ने स्नैच की पहली कोशिश में 107 किग्रा भार उठाया। फिर उन्होंने 111 किग्रा भार उठाने की कोशिश की, लेकिन फाउल कर गए। तीसरी कोशिश में उन्होंने 111 किग्रा भार उठाया।इसी तरह, क्लीन एंड जर्क की पहली कोशिश में 138 किग्रा भार ऑप्ट किया, लेकिन फाउल कर गए। दूसरी कोशिश में भी 138 किग्रा भार ऑप्ट किया, लेकिन इस बार भी वह फाउल कर गए। हालांकि, तीसरी और आखिरी कोशिश में उन्होंने 138 किग्रा का वजन उठाकर सिल्वर पक्का कर लिया। इस कैटेगरी में 12 देशों ने हिस्सा लिया था।कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीतने के साथ ही गुरुराजा ने अगला लक्ष्य तय कर लिया। अब वे 2020 टोक्यो ओलिंपिक की तैयारी में जुटेंगे। जीत के बाद उन्होंने कहा, 'अब मैं ओलिंपिक की तैयारी करूंगा। नेशनल फेडरेशन और हर उस शख्स से जो मेरी जिंदगी का हिस्सा रहा, उससे मुझे बहुत सहयोग मिला है। सभी कोच मेरे प्रदर्शन में निखार लाए हैं।'गुरुराजा ने बताया, 'क्लीन एंड जर्क में जब मेरे दो प्रयास खाली चले गए, तो मेरे कोच ने याद दिलाया कि मेरी जिंदगी इस पदक पर कितनी निर्भर है। मैंने अपने परिवार और देश को याद किया। 2010 में जब मैंने खेलना शुरू किया, ट्रेनिंग के पहले महीने मैं बहुत हताश था, क्योंकि मुझे यही नहीं पता था कि बार को उठाया कैसे जाता है। यह मुझे बहुत कठिन लगता था।'
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