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चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज

     Last Updated:(11:03 AM) 23 Apr 2018
भारत के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को हटाने से जुड़े सात दलों के महाभियोग के प्रस्ताव को राज्य सभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने व्यापक विचार विमर्श के बाद खारिज कर दिया है। शुक्रवार को राजनीतिक दलों से इस बारे में नोटिस मिलने के बाद नायडू 4 दिन की छुट्टी पर आंध्र गए थे, लेकिन मामला गंभीर होते देख वह रविवार को ही दिल्ली लौट आए थे। सोमवार को उपराष्ट्रपति ने इस बारे में फैसला किया। इस फैसले से चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग की मुहिम चलाने वाली कांग्रेस को करारा झटका लगा है।

उपराष्ट्रपति ने तकनीकी आधार पर विपक्ष के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। अपने 20 पेज के आदेश में नायडू ने लिखा है कि यह राजनीति से प्रेरित प्रस्ताव है। आदेश में कहा गया है कि विपक्ष के 71 सांसदों के साइन में 7 पूर्व सांसदों के हस्ताक्षर थे। इसलिए तकनीकी आधार पर इसे खारिज किया जाता है। कांग्रेस के नेतृत्व में सात दलों में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया था। कांग्रेस ने सीपीएम, सीपीआई, एसपी, बीएसपी, एनसीपी और मुस्लिम लीग के समर्थन का पत्र उपराष्ट्रपति को सौंपा था। लेकिन, बिहार में पार्टी के साथ गठबंधन में शामिल लालू प्रसाद की आरजेडी और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस उसके इस प्रस्ताव के साथ नहीं नजर आए। दोनों दलों ने महाभियोग को लेकर हुई मीटिंग में भी हिस्सा नहीं लिया। यह एक अभूतपूर्व कदम था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ कभी भी महाभियोग का प्रस्ताव नहीं आया था। कानून के कई जानकार इसे अभूतपूर्व कदम बता रहे थे। वरिष्ठ वकील फाली नरीमन ने इसे काला दिन बताया था। 
देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल का कहना था कि इसका जस्टिस बी एच लोया की मृत्यु या किसी अन्य मामले से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत में कहा कि न्यायपालिका पर संकट के कारण विपक्ष के पास इसकी सुरक्षा की कोशिश करने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। 
सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज के खिलाफ राज्यसभा के 50 सदस्यों या लोकसभा के 100 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला महाभियोग प्रस्ताव लाने का अधिकार संविधान के आर्टिकल 124 (5) के तहत दिया गया है और इस वजह से यह कानूनसम्मत है। इसका राज्यसभा के अध्यक्ष को सदन में एक विषय पर चर्चा के लिए दिए गए नोटिस से कोई संबंध नहीं है। ये सदन की कार्यवाही नहीं है, यह एक संवैधानिक प्रावधान के तहत शुरू की गई कार्यवाही है और संसद के एक कानून के तहत नियंत्रित है। यह पूरा विवाद गलत है। 
बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने उपराष्ट्रपति के कदम को सही बताया है। उन्होंने हमारे सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ से बातचीत में कहा, 'उपराष्ट्रपति ने बढ़िया कदम उठाया है। उन्होंने सभी मुद्दों पर विचार विमर्श के बाद यह कदम उठाया है। इसका स्वागत होना चाहिए। कांग्रेस के इस प्रस्ताव का उनकी पार्टी में भी विरोध हो रहा था।' 
कांग्रेस के नेतृत्व में लाए गए इस महाभियोग के प्रस्ताव का पार्टी के भीतर भी विरोध हो रहा था। वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद और अश्विनी कुमार ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। खुर्शीद ने कहा था कि इस प्रस्ताव से बचा जा सकता था। वहीं, अश्विनी कुमार ने कहा था कि वह इस प्रस्ताव पर कतई साइन नहीं करते। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।' 

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