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असम विवाद पर चुनाव आयोग ने कहा- सिटीजन रजिस्टर में जिनके नाम नहीं, वे भी वोट डाल सकेंगे

     Last Updated:(2:11 PM) 01 Aug 2018

नई दिल्ली. असम में नेशनल सिटिजन रजिस्टर का ड्राफ्ट जारी होने के बाद चुनावों पर इसके असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने बुधवार को स्पष्ट किया कि जिन लोगों के नाम फाइनल ड्राफ्ट में नहीं हैं उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। वे मतदान की प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं, बस उनका नाम वोटर लिस्ट में होना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए चुनाव आयुक्त ने कहा कि एनआरसी की लिस्ट से बाहर होने पर भी एक आम आदमी राज्य की मतदाता सूची में बना रहेगा, लेकिन इसके लिए उसे चुनाव पंजीकरण अधिकारी के सामने दस्तावेज के जरिए साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है, जनवरी 2019 तक 18 साल का है और जहां से मतदान करना चाहता है उस विधानसभा का रहवासी है। उन्होंने कहा कि इसके लिए चुनाव आयोग एनआरसी की अंतिम सूची का इंतजार किए बगैर जनवरी में एक सूची प्रकाशित करेगा। 

 सोमवार को जारी हुए एनआरसी के फाइनल ड्राफ्ट में असम के 3.29 करोड़ लोगों में से करीब 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। इस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह लोगों का मताधिकार छीनकर चुनावी लड़ाई जीतना चाहती है।  1951 की देश  में पहली बार हुई जनगणना के दौरान नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) बनाया गया था। जिसने गांव में रहने वाले लोगों का विवरण तैयार किया। एनआरसी ने डेटा में व्यक्ति का नाम, आयु, पिता/पति का नाम, घर के पते के साथ आजीविका का साधन शामिल किया था। केंद्र सरकार ने 1951 की जनगणना के दौरान डिप्टी कमिश्नर और उप-मंडल अधिकारियों को इस काम की जिम्मेदारी भी सौंपी थी।  एनआरसी के राज्य संयोजक प्रतीक हजेला ने कहा- किस वजह से लोगों के नाम लिस्ट में शामिल नहीं किए गए, ये सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। हम उन्हें व्यक्तिगत तौर पर ये बताएंगे। ऐसे लोग एनआरसी सेवा केंद्र आकर भी वजह जान सकते हैं। हालांकि, रजिस्ट्रार ऑफिस ने बताया कि असम के सिटीजन रजिस्टर में चार कैटेगरी में दर्ज लोगों को शामिल नहीं किया गया। ये कैटेगरी हैं- 1) संदिग्ध वोटर, 2) संदिग्ध वोटरों के परिवार के लोग, 3) फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जिनके मामले लंबित हैं, 4) जिनके मामले लंबित हैं, उनके बच्चे। इनमें सबसे विवादास्पद कैटेगरी संदिग्ध वोटरों की है। चुनाव आयोग ने 1997 में यह कैटेगरी शुरू की थी। ऐसे 1.25 लाख संदिग्ध वोटर असम में हैं। वहीं, 1.30 लाख मामले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में लंबित हैं।

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